पांवटा साहिब: श्यामलाल पुंडीर
अब फिर से बिशु मेले में रौनक लौट रही है। ग्रामीण अपनी जमीन से जुड़े रहना चाहते हैं बेशक काम रोजगार और शिक्षा के शहरों की ओर पलायन हुआ हैं। लेकिन फिर भी मेलो और त्योहारों में लोग गांव की तरफ चले आते है। गिरिपार क्षेत्र में हर दिन अलग अलग धारों पर बिशु मेले का आयोजन हो रहा है। आज रविवार को आंजभोज के बनोर गांव में बिशु मेले का आयोजन किया गया। इसमें गांव और क्षेत्र के कई लोग शामिल हुए। इस अवसर पर मेला ग्राउंड में देव पालकी लाई गई। इसके साथ ही जातर भी पहुंची। मेला ग्राउंड में रासे नाटी भी की गई।
गौरतलब है कि जिले में कई क्षेत्रों में बिशु मेलों का आयोजन किया जाता है। जोकि पारंपरिक संस्कृति की झलक है। बनोर गांव में भी हर वर्ष इस मेले का धूमधाम से आयोजन किया जाता है। गांव के पूर्व प्रधान चतर चौहान, नेतर चौहान, प्रताप चौहान, दया राम चौहान, आशु चौहान, भरत चौहान, अनिल चौहान, रामलाल शर्मा, मोहन सिंह चौहान, सुरेंद्र चौहान ने बताया कि यह हमारी पारंपरिक लोक संस्कृति है। इसको बरकरार रखना सभी ग्रामीणों का दायित्व है। उन्होंने कहा कि इस मौके पर युवाओं से भी आह्वान किया जाता है कि देवभूमि को नशा मुक्त बनाएं। साथ ही संदेश दिया गया कि अपनी संस्कृति का संरक्षण अवश्य करें।
जिला सिरमौर के पांवटा साहिब उप मंडल के तहत आंज भोज क्षेत्र में बिशु मेले की शुरुवात के बाद अब हर दिन क्षेत्र की ऊंची पहाड़ियों पर अलग अलग गांव में बिशु मेले एक महीने तक चेलेगे। वीरवार को टौंरु गांव की बुंगा टिम्बी पर स्थित प्रसिद्ध शिरगुल महाराज के मंदिर परिसर में बिशु मेला बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। और आज शुक्रवार को भरली पंचायत के कांडों में बिशु मेला मनाया गया।
इस बिशु मेले पर टौंरू, भैला व क्लाथा गांव के वरिष्ठ लोगों सहित युवा व युवतियों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। इस मौके पर टौंरु, भैला व क्लाथा तीनों गांव के सभी ग्रामवासी के अलावा आसपास के ग्रामीणों ने भी भाग लिया।
टौंरु के ग्रामीणों ने बताया कि बुंगा टिम्बी पर स्थित प्रसिद्ध शिरगुल महाराज के मंदिर परिसर में बिशु मेला बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। बिशु मेले जहां सांस्कृतिक धरोहर को संजोकर रखने वाले में अहम भूमिका निभाते है।
गौरतलब है कि सिरमौर जिले के गिरिपार क्षेत्र में बैसाख संक्रांति से बिशु मेले शुरू हो जाते हैं। और हर दिन अलग अलग स्थानों पर बिशु मेले लगते है।यह सिलसिला पूरे माह चलता है। गिरीपार क्षेत्र के आंज-भोज के गांव टौंरु के बुंगा टिम्बी स्थित शिरगुल महाराज मंदिर परिसर में बिशु मेला बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।
ग्राम पंचायत टौंरू डांडा-आंज की प्रधान कमला देवी, उपप्रधान रामलाल चौहान, भैला पंचायत प्रधान मनीष तोमर, कलाथा बढ़ाना पंचायत प्रधान देवराज नेगी और भरली पंचायत की प्रधान रीना चौहान ने बताया कि बिशु मेले लोगों की धार्मिक आस्था से भी जुड़े हैं। सोमवार को बुंगा बिशु मेला बड़े धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।
कुल देवता की पूजा अर्चना
बिशु मेले में क्षेत्र की 11 पंचायतों के ग्रामीण भाग लेते है। कई गांव के लोग जातर लेकर अपने कुल देवता की पूजा अर्चना करते हैं। इस दौरान मेले में पुरुष, महिलाओं तथा बच्चों द्वारा खरीददारी की जाती है। और पुरुष, महिलाओं, युवा तथा युवतियों द्वारा माला नृत्य (रासे) किया की परंपरा और संस्कृति निभाई जाती है।
ठोडा नृत्य होता है मुख्य आकर्षण
बिशु मेले में तीर कमान से होने वाला ठोडा नृत्य मुख्य आकर्षण रहता है। इस खेल में दो दल होते हैं। दोनों दल विशेष परिधान पहन कर क्षत्रिय वीरगाथा गाते व ललकारते हुए एक दूसरे पर तीरों से प्रहार करते हैं। यह प्रहार टांगों पर घुटने के नीचे किये जाते हैं, जो दल सबसे अधिक सफल प्रहार करता है उसे विजेता घोषित किया जाता है । कुछ बिशु मेलो में शाठी पाशी के बीच ठोड़ा युद्व भी खेला जाता है। एक ऐसी जंग कौरव-पांडवो के वशजो के बीच में होती है। टौरू गांव के बुगा का बिशु मेले का आयोजन हो चुका है।
बिशु मेले की मान्यताएं
इस बिशु मेले को मनाने पर एक मान्यता ये है कि खेतों में गेहूं की फसल आने के बाद खुशी में त्यौहार को मनाते हैं। इस तरह का एक त्यौहार देश के पूर्वोत्तर के राज्य असम में भी मनाया जाता है। जिसे बिहु कहा जाता है। इस त्यौहार को भी असम के लोग फसल आने की खुशी में मनाते है।
इन मेलो में युवक-युवतीयां सजे परिधानो में पहुचते और धारो पर रासे यानि माला नृत्य होता हैं। झुरी-ब्यूरी के साथ वीरगाथाएं गाई जाती है। परंपरागत वाद्य यंत्रो के साथ पहाड़ी गीतों की धुन पर रासे लगाए जाते है।
अब कहां कहां लगेगे बिशु मेले
बूंगा टिंबी में वीरवार और भरली गांव के कांडो शुक्रवार को बिशु मेला मनाया गया। अब रविवार को बनोर में बिशु मेले होगा। इसके बाद रण बाग, जाखना, सतौन व आखिरी में बिशु मेला खेरवा उतराखंड सीमा में मनाया जाता है।

