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Wed. Apr 22nd, 2026

शिखर दर्शनम् पाप नाशम,कुरूड़ और शांत महायज्ञ के बारे में पढ़िए पूरी खबर… आज 52 साल बाद चूड़धार में शांत के साक्षी बनेगें हजारों शिरगुल भक्त

शिखर दर्शनम् पाप नाशम,कुरूड़ और शांत महायज्ञ के बारे में पढ़िए पूरी खबर… आज 52 साल बाद चूड़धार में शांत के साक्षी बनेगें हजारों शिरगुल भक्त

श्यामलाल पुंडीर (संपादक ) देश की आवाज न्यूज

पांवटा साहिब: जिला सिरमौर और शिमला के चूड़धार में शिरगुल महाराज मंदिर में आज 11 अक्टूबर को 52 साल बाद शांत महायज्ञ का भव्य आयोजन किया जा है। इस यज्ञ में लगभग 600 स्वयंसेवक इंतजाम और सेवा में लगे है। इस धार्मिक स्थल पर लगभग 30 हजार से अधिक श्रद्धालुओं के पहुंच चुके है।

क्या है कुरूड़

कुरूड़ हिमाचल प्रदेश के शिमला सिरमौर और सोलन जिला एवं जौनसार के कुछ क्षेत्रों के मन्दिर निर्माण की प्रक्रिया के सम्पन्न होने के बाद मन्दिर के ऊपर छत पर लगाई जाने वाली लकड़ी होती है जिसे कुरूड़ कहा जाता है।

यह देवदार की लंबी शहतीर होती है जिसे बीच में कुरेद कर बनाया जाता है ताकि ढलान दार छत की चोटी के किनारों पर फिट आ जाए।फिर बीच में इस लकड़ी पर सोने का या सोने से मढ़ा एक हांडा अथवा कलश जो निकले गुंबद की तरह होता उसे स्थापित किया जाता है जो विशेष ऊर्जा देता है।

शिखर दर्शनम् पाप नाशम”

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मन्दिर के ऊपर ये चिन्ह या शिखर इसलिए ऊंचे लगाए जाते हैं ताकि दूर से ही दिखाई पड़े। ऐसा इसलिए होता है कि यदि कोई मन्दिर न भी जा सके तो दूर से ही मंदिर शिखर के दर्शन करने से वही पुण्य मिलता है जो मूर्ति दर्शन से मिलता है। इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है

कि”शिखर दर्शनम् पाप नाशम” बल्कि उत्तर भारत के मन्दिरों की वास्तुकला में इसे शिकारा भी कहा जाता है। कुरूड़ की लकड़ी काटने से पहले पेड़ का पूजन किया जाता है उसके बाद काट कर कुरूड़ बनाई जाती है बनाने के बाद उसे फिर धरती पर नहीं रखा जाता।अगर कहीं रखना भी पड़ तो धरती से ऊपर उठे आसन पर रखा जाता है। इस कुरुड़ को लोग कंधे पर उठा कर बड़े जोश व उत्साह के साथ मन्दिर स्थल तक पहुंचाते है इस दौरान विशेष जयकारें भी लगाते है। फिर मंत्रोच्चार के साथ इसे मन्दिर के शीर्ष पर स्थापित कर दिया जाता है।

क्या है शांत महायज्ञ

इसी दौरान शांत महायज्ञ भी किया जाता है। अर्थात शस्त्रों की पूजा भी की जाती। इसे आमतौर पर शान्त नाम भी दिया जाता है और प्रक्रिया में भी थोड़ा बहुत बदलाव होता है। एक प्रकार से यह मंदिर निर्माण के उपरांत समापन समारोह भी कह सकते है। इसमे देवता महाराज से जुड़े सभी परगनों के नम्बरदार, कारदार देवलू आदि किसी भी तरह से जुड़े लोग लोग तो अनिवार्य रूप से भाग लेते ही है बल्कि देवता महाराज के से जुड़ा समस्त समाज भाग लेता है। और विभिन्न स्थानों से देव पालकियों के साथ भक्त पहुंच चुके हैं।

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