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Wed. Apr 1st, 2026

खबर को पढ़कर आपकी आंखें भी होगी नम….

खबर को पढ़कर आपकी आंखें भी होगी नम….
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श्यामलाल पुंडीर संपादक देश की आवाज
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वो अपने माता पिता का जिगर का टुकड़ा था। एक हादसे से कोमा में चला गया। बचाने के सभी प्रयास विफल। 13 सालों तक ईलाज चला। मां बाप के सामने वो जीवित तो था। लेकिन कोमा में था। बात नहीं कर सकता था। मां अपने बेटे के कानों में कुछ बोलती रहती थी। काश बेटा बच जाता। लेकिन मौत से बच नहीं सकता था। जब सभी संभावनाएं खत्म हुई तो मां बाप को अपने जिगर के टुकड़े को मौत देने यानी इच्छा मृत्यु के लिए कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। जब हमारा बेटा ठीक नहीं हो सकता तो उसको मौत दे दो।

अब डॉक्टर कैसे देगे मौत

एम्स के पैलेटिव केयर सेंटर में हटाई जाएगी लाइफ सपोर्ट, जिसमें सीएएन भी शामिल है, उसे बंद किया जाएगा। 30 दिन की पुनर्विचार अवधि को भी माफ कर दिया गया है। एम्स मरीज को अपने पैलेटिव केयर सेंटर में भर्ती करेगा, ताकि सीएएन हटाने की प्रक्रिया वहां पूरी की जा सके। एम्स मरीज को घर से पैलेटिव केयर सेंटर तक लाने की पूरी व्यवस्था भी करेगा।

बीटेक टॉपर थे हरीश

13 साल पहले हादसे ने बदली जिंदगी 32 वर्षीय हरीश चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में बीटेक कर रहे थे। परिवार के अनुसार वे टॉपर थे। 2013 में पेइंग गेस्ट हाउस की चौथी मंजिल से गिरकर उन्हें गंभीर दिमागी चोट लगी। तब से वे पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट (पीएसवी) में हैं। हालत में कोई सुधार नहीं। क्लिनिकली एडमिनिस्टर्ड न्यूट्रिशन (सीएएन) पर जिंदा हैं। ये भी सर्जरी के जरिए लगाए गए पीईजी ट्यूब के जरिये दिया जा रहा है। कोर्ट ने माना कि सीएएन भी एक तरह का इलाज है। इसे प्राइमरी और सेकंडरी मेडिकल बोर्ड के उचित निर्णय के आधार पर हटा सकते हैं।

तंगी में पूरा परिवार… घर बिका, पिता सैंडविच बेचने पर मजबूर

हरीश के पिता अशोक ने कहा, कौन माता-पिता बेटे के लिए ऐसा चाहेंगे। पड़ोसियों के अनुसार, इलाज के लिए उन्होंने दिल्ली का घर बेच दिया। अशोक को करीब 3,600 रुपए मासिक पेंशन मिलती है। गुजारे के लिए वे क्रिकेट मैदानों में सैंडविच बेचते हैं।

जज बोले- परिवार ने कभी साथ नहीं छोड़ा

कोर्ट ने हरीश राणा के माता-पिता की विशेष रूप से सराहना की और कहा कि उन्होंने अपने बेटे के प्रति गहरा प्रेम और देखभाल दिखाई है। जस्टिस पारदीवाला ने कहा, ‘परिवार कभी भी उनका साथ छोड़कर नहीं गया। किसी से प्रेम करने का मतलब है कि सबसे कठिन समय में भी उसकी देखभाल करना।’ जस्टिस विश्वनाथन ने कहा, ‘हरीश के माता-पिता तथा भाई-बहनों ने सर्वोत्तम इलाज दिलाने के लिए हर संभव प्रयास किया। उन्होंने जो पीड़ा और मानसिक कष्ट झेला होगा, उसकी कल्पना ही की जा सकती है।

इच्छामृत्यु के 2 तरीके

पैसिव यूथेनेशिया और एक्टिव
यूथेनेशिया पैसिव में इलाज, लाइफ सपोर्ट रोकते हैं, ताकि प्राकृतिक मृत्यु हो । एक्टिव यूथेनेशिया में मृत्यु के लिए दवा
या इंजेक्शन देते हैं। भारत में सिर्फ पैसिव यूथेनेशिया की इजाजत है, वो भी नियमों
तहत एक्टिव यूथेनेशिया गैर कानूनी है।
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया पर दो नियम बनाए थे। पहला, ‘लिविंग विल’। व्यक्ति लिख सकता है कि
लाइलाज बीमारी पर उसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम से हटा दिया जाए। लिविंग विल न होने की स्थिति में 2018 में बनाए गए
और 2023 में संशोधित नियमों की प्रक्रिया माननी पड़ेगी।

अब 13 साल से कोमा में गए युवक का लाइफ सपोर्ट हटेगा

सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार इच्छामृत्यु की इजाजत दी है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को देश में पहली बार पैसिव यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु) की इजाजत दी। कोर्ट ने 13 साल से कोमा में गए 32 वर्षीय हरीश राणा की लाइफ सपोर्ट हटाने को मंजूरी दी है। युवक के पिता ने गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार का हवाला दे ये इजाजत मांगी थी। कोर्ट ने एम्स दिल्ली को निर्देश दिया कि लाइफ सपोर्ट हटाने की प्रक्रिया तय और विशेष योजना के तहत करें, ताकि मरीज की गरिमा बनी रहे। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने केंद्र सरकार से पैसिव यूथेनेशिया पर व्यापक कानून बनाने पर विचार करने को भी कहा।

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