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यहां 342 साल से सजता है कवि दरबार मां यमुना ने भी दिया था गुरु को सम्मान

श्यामलाल पुंडीर

पांवटा साहिब : सिखो के 10वे गुरु श्री गुरूगोंबिद सिंह महाराज की ओर से शुरू की गई पांवटा में होला मोहल्ला मानने की परंपरा 342 साल बाद भी जीवंत है। मेला ही नहीं गुरु द्वारा तब शुरू की गई
52 कवियो की कवि दरबार सजाने की परंपरा 342 साल बाद आज भी कायम है। श्री गुरूद्वारा पांवटा साहिब की ओर से इस बार 342वां होला मोहल्ला मनाया जा रहा है। जब से यह मेला शुरू हुआ है तब से गुरूद्वारा साहिब में कवि दरबार सजता है। इस कवि दरबार में उच्च कोटि के पंथक कवि अपनी रचनाएं सुनाकर संगतो को निहाल करते हैं। जब से श्री गुरूगोंबिद सिंह महाराज ने यमुना तट के किनारे कवि दरबार की स्थापना की।

तब से यहां पर 52 कवियों का कवि दरबार सजता हैं। शुक्रवार को भी कवियों ने अपनी अपनी रचनाएं पेश की। इतिहासकारो के अनुसार एक बार जब कवि दरबार सजा था। और कवि अपनी अपनी रचनाएं सुना रहे थे। तो बगल से बह रही यमुना नदी के शोर से कवि दरबार में व्यवधान पड़ रहा था। तब श्री गुरूगोबिंद सिंह महाराज ने मां यमुना से निवेदन किया कि यहां पर शांत होकर बहे। तब से कवि दरबार के पास से आज भी यमुना नदी शांत होकर बहती है। यहां पर यमुना का शोर नहीं है। जबकि इसके आगे व पीछे यमुना नदी की कल कल ध्वनि होती है। इसके अलावा गुरू जी ने यहां पर अपनी बहुत सी वाणी की रचना की। मां यमुना ने गुरु को सम्मान दिया।

गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के उप प्रधान सरदार हरभजन सिंह ने कहा कि हिमाचल प्रदेश की शिवालिक पहाड़ियों की गोद में यमुना नदी के तट पर बसा खूबसुरत शहर पांवटा साहिब इतिहास की कई यादें अपने में समेटे हुए है। गुरूगोंबिद सिंह महाराज ने ही इस शहर की नींव रखी। और जीवन के अमूल्य साढ़े चार वर्ष यहीं बिताए। सिरमौर रियासत के तत्कालीन राजा मेदनी प्रकाष के निमत्रंण पर गुरू गोंबिद सिंह महाराज 1685 ईंसवी में पांवटा आए। गुरू जी का यहां पांव टिका तो इस शहर का नाम पांवटिका हुआ और बाद पांवटा साहिब हो गया। इतिहासकारों मुताबिक पाव टिकयों सतिगुर को आनंदपुर ते आए। नाम धरयों इस पांवटा, सब देसन प्रगटाए। गुरुद्वारा साहिब में आज भी गुरू जी की निशानियां आज भी मौजूद है। उनकी लेखनी व उनके अस्त्र-शस्त्र श्रद्वालुओं को देखने के लिए सीसे के शो केस में रखे गए है। देशभर के विभिन्न शहरों से लाखों की संख्या में संगते आती है। यहां के यमुना नदी के तट पर पवित्र स्नान श्रद्वालु करते है। गुरूद्वारा में मत्था टेकते है। गुरूद्वारे में अटूट लंगर चलता है। अब यह शहर अंतर्राष्ट्रीय मानचित्र पर अपनी अलग व विशेष पहचान बना चुका है। जहां पर कवि दरबार सजता था अब उस स्थान को पक्का का विशाल भवन बना दिया है।

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