भगत सिंह का क्रांतिकारियों के नाम पत्र
मुझे दंड सुना दिया गया है और फांसी का आदेश हुआ है। इन कोठरियों में शायद मैं ही एक ऐसा आदमी हूं, जो बड़ी बेताबी से उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा है, जब मुझे अपने आदर्श के लिए फांसी के फंदे पर झूलने का सौभाग्य प्राप्त होगा। मैं खुशी के साथ फांसी के तख्ते पर चढ़कर दुनिया को दिखा दूंगा कि क्रांतिकारी अपने आदर्शों के लिए
कितनी वीरता से बलिदान दे सकते हैं।
तुम्हें आजीवन कारावास हुआ है। तुम्हें जीवित रहकर
दुनिया को दिखाना है कि क्रांतिकारी अपने आदर्शों के लिए केवल मर ही नहीं सकते, बल्कि जीवित रहकर हर मुसीबत का मुकाबला भी कर सकते हैं। मृत्यु सांसारिक कठिनाइयों से मुक्ति पाने का साधन नहीं बननी चाहिए, बल्कि जो क्रांतिकारी फांसी से बच गए हैं, उन्हें दुनिया को दिखाना चाहिए कि वे न सिर्फ आदशों के लिए फांसी पर चढ़ सकते
हैं, बल्कि जेलों के अत्याचारों को सहन भी कर सकते हैं।
(सेंट्रल जेल, लाहौर नवम्बर, 1930)
तुम्हारा, भगत सिंह
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चार्ली चैप्लिन का बेटी को लिखा पत्र
उड़ो, और उड़ो, पर पांव
धरती पर टिके रहें
मेरी प्यारी बेटी, रात का समय है। मेरे इस छोटे-से घर की सभी निहत्थी लड़ाइयां सो चुकी हैं। तुम्हारे भाई-बहन भी नींद की गोद में हैं। तुम्हारी मां भी सो चुकी हैं। मैं अधजगा हूं, कमरे में धीमी-सी रोशनी है। तुम्हारी तस्वीर मेज पर है और मेरे दिल
मैं में भी, पर तुम कहां हो? वहां सपने जैसे भव्य पेरिस में किसी शानदार मंच पर नृत्य कर रही हो। रात के सन्नाटे में मैं तुम्हारे कदमों की आहट सुन सकता हूं। इतना सुंदर नृत्य ! सितारा बनो, चमकती रहो। परंतु यदि दर्शकों का उत्साह और उनकी प्रशंसा तुम्हें मदहोश करती है या उनसे उपहार में मिले फूलों की गंध तुम्हारे सिर चढ़ती है तो एक कोने में बैठकर मेरा खत पढ़ते हुए अपने दिल की आवाज सुनना ।
… मैं तुम्हारा पिता, चार्ली चैप्लिन! मैं फटी पतलून में नाचा करता था और मेरी राजकुमारी, तुम रेशम की खूबसूरत ड्रेस में नाचती हो । ये नृत्य और ये शाबाशी तुम्हें सातवें आसमान पर ले जाने के लिए सक्षम हैं। उड़ो और उड़ो, पर ध्यान रखना कि तुम्हारे पांव सदा धरती पर टिके रहें। ढेर सारे प्यार के साथ।
चार्ली, वर्ष 1965

