आज सनातन धर्म सभा की ओर से एसडीएम को ज्ञापन दिया गया जिसमें मांग की गई कि ईसाई और इस्लाम धर्म अपनाने वाले दलितों को अगर आरक्षण दिया तो पूरे देश में धर्मांतरण की घटनाएं बढ़ेगी।
ज्ञापन में कहा गया है कि अनुसूचित जनजाति समुदाय को 7.5% आरक्षण प्रदान किया गया है, जबकि अनुसूचित जाति समुदाय को 15% आरक्षण प्रदान किया गया है। जबकि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या का अनुपात बहुत अधिक है। सदियों से
इस्लाम / ईसाई पंथ में परिवर्तित दलितों को लाभ देने से मौजूदा अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति समुदाय के अधिकार प्रभावित होंगे।
रंगनाथन मिश्रा गमिति की रिपोर्ट बिना साक्ष्य एकत्र किए कमरे में तैयार की गई थी, जिसमें ईसाई /इस्लाम अपनाने वाले दलितों पर हुए अत्याचारों के बारे में कोई डेटा नहीं था।
रंगनाथन गमिति ने अदूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाया है और ऊपर उठाए गए बिंदुओं की जांच नहीं की है। इसलिए, रंगनाथन समिति की रिपोर्ट इस्लाम/ईसाई पंथ परिवर्तित करने वाले दलितों को आरक्षण प्रदान करने का आधार नहीं बन सकती है।
आज तक ऐसा कोई डेटा उपलब्ध नहीं है जो उक्त खंड में ईसाई पंथ /इस्लाम को शामिल करके संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के खंड 3 के संशोधन को सही ठहराता हो।
ईसाई /इस्लाम अपनी पसंद की स्वतंत्रता के रूप में नहीं, बल्कि शक्तिशाली, तथाकथित धार्मिक संगठन, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय द्वारा अन्य लाभों के लिए ऐसा करने का लालच देने पर अपनाया है। ईसाई /इस्लाम अपनाने वाले दलितों को आरक्षण देने से धन बल के लालच में धर्मांतरण बढ़ेगा। इसलिए आरक्षण के पहलू पर फैसला करने से पहले हर बिंदुओं पर विचार करें।
