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संसदीय गतिरोध राष्ट्र के विकास में बाधक : डॉ मामराज पुंडीर

संसदीय गतिरोध राष्ट्र के विकास में बाधक :   डॉ मामराज पुंडीर

पांवटा साहिब: डॉ मामराज पुंडीर प्रान्त महामंत्री, अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ हिमाचल प्रदेश ने कहा है कि संसद की कार्रवाई को बाधित करना एवं संसदीय गतिरोध आमबात हो गयी है।

यही स्थिति संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण में देखने को मिल रही है, इस सत्र को शुरू हुए पांच दिन बीत चुके हैं, लेकिन दोनों सदनों में हंगामे और नारेबाजी के अतिरिक्त और कुछ नहीं हुआ है।

जहां सत्तापक्ष संसद में अपनी इस मांग पर जोर दे रहा है कि राहुल गांधी ने अपनी लंदन यात्रा के दौरान भारतीय लोकतंत्र के बारे में जो कुछ कहा, उसके लिए उन्हें माफी मांगनी चाहिए, वहीं कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दल अदाणी मामले की जांच संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी से कराने पर अड़े हुए हैं और संसद नहीं चलने दे रहे हैं।

विरोध प्रकट करने का असंसदीय एवं आक्रामक तरीका, सत्तापक्ष एवं विपक्ष के बीच तकरार और इन स्थितियों से उत्पन्न संसदीय गतिरोध लोकतंत्र की गरिमा को धुंधलाने वाले हैं। सार्थक बहस की बजाय शोर-शराबा और नारेबाजी की स्थितियां कैसे लोकतांत्रिक कही जा सकती है?

स्पष्ट है कि यदि दोनों पक्ष अपने-अपने रवैये पर अडिग रहते हैं तो संसद का चलना मुश्किल ही होगा। यदि ऐसा होता है तो यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण होगा।

संसद का यह सत्र इसलिये भी आक्रामक बना हुआ है कि पक्ष एवं विपक्ष दोनों की ही नजरों में वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव है। इसीलिये इसके आसार नहीं कि राहुल गांधी माफी मांगेंगे, वैसे ही इसके भी कोई संभावना नहीं कि मोदी सरकार अदाणी मामले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति गठित करने की विपक्ष की मांग मानने के लिए तैयार हो जाएगी।

इसका एक कारण तो यह है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही छह सदस्यीय समिति के गठन की घोषणा कर चुका है और दूसरा यह कि वित्तीय मामलों में अब तक गठित संयुक्त संसदीय समितियों ने जांच के नाम पर या तो लीपापोती की है या फिर दलगत राजनीति।

इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि अदाणी मामले की जांच संयुक्त संसदीय समिति से कराने की विपक्ष की मांग का मुख्य उद्देश्य इस मामले को अगले आम चुनाव तक जिंदा रखना है। चूंकि सरकार विपक्ष के इस इरादे को भांप चुकी है, इसलिए वह उसकी मांग पर ध्यान देने के लिए तैयार नहीं। कैसी विचित्र एवं त्रासद स्थिति है कि सबके सामने देश नहीं, सत्ता का स्वार्थ है।
देश को बनाने एवं विकास की रफ्तार देने के लिये बजट का लोकतांत्रिक तरीकों से पारित होना जरूरी है। यदि ऐसा नहीं होता है तो यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण होगा। ऐसी भी परिस्थिति आ सकती है कि बजट को बिना बहस के पारित कराना पड़े। यह ठीक नहीं होगा, लेकिन संसद तभी चल सकती है, जब दोनों पक्ष अपना-अपना हठ छोड़ेंगे। फिलहाल इसके आसार नहीं दिख रहे हैं।

भारतीय राजनीति में आज इतनी शालीनता भी नहीं बची कि अपनी गलती को गलती के रूप में स्वीकार कर आगे ऐसी त्रासद घटनाओं के न होने के लिये संकल्पित हो।

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