
पांवटा साहिब : हाटी समुदाय एक बार फिर से सुर्खियों में पर इस बार वजह कुछ और है। हाटी समुदाय जनजातीय दर्जा मिलने को लेकर उत्साहित है और गृहमंत्री अमित शाह का सम्मान एक बड़ी रैली के रूप में करने जा रहा है। हक की लड़ाई थी हाटी समुदाय का ।यह आदोंलन, 55 वर्षों से निरंतर संघर्ष करते हाटी समुदाय की मांग को आखिर भाजपा ने पूरा किया। यह आंदोलन स्वार्थ से हटके एक अस्तित्व की जंग थी जो जनता ने लड़ी। हाटी समुदाय की मांगों को हमेशा दरकिनार किया गया।
यह हाटी समुदाय की जनता का हक था पर पूर्वर्ती सरकारों ने इसको हट समझा। प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद एक बार पुनः इसकी मांग तेज हो गई। भाजपा सरकार ने हाटी समुदाय से वादा किया और आखिर उस वादे को पूरा भी किया। केंद्र की मोदी और राज्य की
जयराम की डबल इंजन सरकार ने आखिर हाटीयों की मांग को पूरा किया। इसका पूरा श्रेय डबल इंजन सरकार को ही जाता है।
मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने जहां इस दिशा में तेजी से कार्य करते हुए ना केवल नोडल एजेंसी का निर्माण किया बल्कि खुद कार्यों की समीक्षा भी की। इतने बड़े कार्य को पूर्ण करने के लिए सभी की सहभागिता की आवश्यकता होती है। मांग पूरी हो सके और कोई बाधा ना आए, इसके पीछे कई दिनों की मेनहत और कई लोगों का प्रयास शामिल है। निरंतर विषय की समीक्षा करना एवं प्रगति की ओर कदम बढ़े यह सुनिश्चित करने के लिए खुद भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सुरेश कश्यप और बलदेव तोमर ने मोर्चा संभाला।
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष व शिमला संसदीय क्षेत्र से सांसद सुरेश कश्यप ने इस कार्य को लेकर बेहद गंभीरता दिखाई व
स्वयं नियमित प्रशासनिक संवाद बनाएं रखा। बलदेव तोमर ने सरकार और हाटीयों के बीच में पुल का काम किया और मुद्दे को गंभीरता से प्रदेश सरकार व केंद्र सरकार के समक्ष रखा और इस कार्य को पूर्ण भी करवाया।
आखिर हाटीयों के इस आंदोलन से कॉंग्रेस की दूरी भी सवालों के घेरे में रही। एक तरफ हाटी समुदाय को जनजातीय दर्जा मिलने के बाद प्रतिभा सिंह का नरम रवैया दूसरी तरफ कोंग्रेस के वर्तमान विधायक हर्ष वर्धन और रेणुका के विधायक विनय कुमार का हाटी विरोधी आन्दोलन पर पक्ष रखना काँग्रेस की एक विषय पर कॉंग्रेस की दोहरी मानसिकता को भी दर्शाता है। अगर हाटी समुदाय को आरक्षण देना बड़ा विषय था तो क्यों 2005 में केंद्र व प्रदेश की कॉंग्रेस सरकारें इस मांग को पूरा नहीं कर पाई?
कांग्रेस ने वर्ष 1967 से इस मुद्दे को बस राजनितिक फायदे के लिए जिन्दा रखा और अंत में भाजपा ने हाटी समुदाय की मांग को पूरा कर बाजी मार ली। अनेकों बार केंद्र और प्रदेश में कांग्रेस की सरकार होने के बाद भी हाटी समुदाय के मुद्दे पर सहमति ना बन पाना काँग्रेस की नाकामी से कम नहीं।
चुनावी मौसम में ऊंठ किस और बैठेगा यह भविष्य के आगोश में है पर हाटी का असली साथी बनकर भाजपा ने जो दांव खेला है,
शायद इसका जवाब काँग्रेसी नेताओं के पास नजर नहीं आ रहा है। आखिर हाटी के साथी के रूप में की उम्मीद पर खुद ही काँग्रेस नेताओं ने ब्रेक लगा दिया है।
